प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर टिप्पणी करते हुए बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसे ‘काल्पनिक कानून’ के आधार पर सुनाया गया था। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सारन की खंडपीठ ने इस मामले में संबंधित न्यायिक अधिकारी की कार्यशैली को ‘अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक’ करार देते हुए गहरी नाराजगी व्यक्त की है। यह कानूनी संकट तब पैदा हुआ जब फैमिली कोर्ट ने एक ऐसी याचिका पर फैसला सुना दिया जो ‘मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986’ के तहत दायर की गई थी। जबकि हकीकत यह है कि भारत में इस नाम का कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि याचिकाकर्ता से कानून की धारा या नाम लिखने में त्रुटि हो सकती है, लेकिन एक अदालत का यह प्राथमिक उत्तरदायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि जिस कानून के तहत वह आदेश पारित कर रही है, वह वास्तव में प्रभावी हो। इस मामले में, पत्नी ने संभवतः ‘मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939’ का संदर्भ लेना चाहा था, लेकिन अदालत ने न केवल याचिका की त्रुटि को नजरअंदाज किया, बल्कि अपने पूरे निर्णय में बार-बार उस गैर-मौजूद कानून का उल्लेख करते हुए राहत भी प्रदान कर दी। खंडपीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि याचिका की गलती ट्रायल कोर्ट को वही गलती दोहराने का लाइसेंस नहीं देती।
जनवरी 2026 में आए इस आदेश को पति हाफिज द्वारा दी गई चुनौती को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने इसे विधि और तथ्य, दोनों ही मोर्चों पर दोषपूर्ण माना है। अदालत ने अब इस मामले को वापस बांदा फैमिली कोर्ट भेज दिया है, जहाँ सही कानूनी प्रावधानों के तहत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तीन महीने के भीतर नया फैसला लेने का निर्देश दिया गया है। उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी निचली अदालतों के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि न्यायिक आदेशों में औपचारिकता और कानूनी शुद्धता के प्रति किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

