सरगुजा। सुशासन तिहार के नाम पर सरकार लगातार “सफलता की कहानियां” गिनाने में लगी हुई है। कहीं एक किसान को किसान क्रेडिट कार्ड मिलने को बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है, तो कहीं किसी एक हितग्राही को योजना का लाभ देकर पूरे सिस्टम को सफल साबित करने की कोशिश हो रही है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या एक-दो लोगों की कहानी दिखाने से जमीनी हकीकत बदल जाती है? आज भी प्रदेश में लाखों किसान, बुजुर्ग और गरीब परिवार सरकारी योजनाओं के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। किसी का पीएम आवास अधूरा पड़ा है, किसी की पेंशन अटकी है, तो कोई किसान अब भी कर्ज और आर्थिक तंगी से जूझ रहा है।
सरकार यह दावा कर रही है कि अब गांव में ही समस्याओं का समाधान हो रहा है। लेकिन अगर व्यवस्था इतनी ही बेहतर है, तो फिर आज भी इतने लोग अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए परेशान क्यों हैं?
सुशासन तिहार के नाम पर कैमरे के सामने कुछ चुनिंदा लोगों को लाभ देकर “सुशासन” का प्रचार किया जा रहा है, जबकि बड़ी संख्या में जरूरतमंद लोग अब भी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सरकार सिर्फ चुनिंदा चेहरों को दिखाकर उपलब्धियां गिना रही है या वास्तव में हर जरूरतमंद तक योजनाओं का लाभ पहुंच रहा है?

