कभी नानचाकू घुमाते हुए तो कभी किसी शादी में दुल्हन के साथ नाचते हुए दिखने वाले विधायक रामकुमार टोप्पो अब सवालों के घेरे में हैं। जिनको जनता ने भारी बहुमत से विधायक बनाकर विधानसभा भेजा, उनसे अब गांव की प्यास बुझाने की गुहार लगा रहे है। लेकिन अफ़सोस, एक साल से अधिक कार्यकाल के बाद भी बदलाव का नामोनिशान नवापारा जैसे गांवों में नहीं दिखता।
सीतापुर विधानसभा क्षेत्र के नवापारा गांव की हालत कुछ ऐसी है जो आज के डिजिटल इंडिया की आंखें खोलने के लिए काफी है। इस गांव में आज भी 50 घर एकमात्र हैंडपंप या नल पर निर्भर हैं। महिलाएं सुबह से लाइन लगाकर बैठ जाती हैं, बच्चे स्कूल जाने से पहले पानी भरने की जिम्मेदारी निभाते हैं और बुजुर्ग दूर-दराज़ से पीने का पानी ढोते हैं। केंद्र सरकार की बहुप्रचारित ‘हर घर नल, हर घर जल’ योजना यहां केवल पोस्टर-बैनर और घोषणाओं तक सिमट कर रह गई है। गांव की ज़मीन पर उसका कोई असर नहीं दिख रहा है।
जनता ने 2023 में रामकुमार टोप्पो को एक ईमानदार और जमीनी नेता मानकर चुना था। साथ ही पूर्व सैनिक का भौकाल बनाकर लोगों को उम्मीद ऐसी जगा दी कि वे अनुशासन, ज़िम्मेदारी और जनता के लिए समर्पण के साथ काम करेंगे। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, जनता को यह समझ आने लगा कि विधायक साहब का फोकस ज़मीन की समस्याओं से ज़्यादा अपने निजी प्रचार-प्रसार और दिखावे पर है। सोशल मीडिया पर नाचते-गाते वीडियो, नानचाकू अभ्यास करते हुए रील्स — ये सब सुर्खियों में हैं, लेकिन नवापारा की बदहाली कहीं किसी कैप्शन या पोस्ट में जगह तक नहीं पा सकी।
गांव वालों का कहना है कि उन्होंने कई बार शिकायतें कीं, मांग उठाई, नेताओं को अवगत कराया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। सवाल यह उठता है कि क्या एक जनप्रतिनिधि का काम सिर्फ़ आयोजनों में शामिल होना, कैमरे के सामने दिखना और अपनी छवि चमकाना है? क्या यही वजह थी कि जनता ने उन्हें विधायक के पद पर बैठाया था? या फिर जनता ने उन्हें इसलिए चुना था कि वे उनके दुख-दर्द को समझें, ज़मीन पर उतरकर असल समस्याओं का हल निकालें?
रामकुमार टोप्पो का अब तक का कार्यकाल जनता के लिए एक गहरी निराशा साबित हो रहा है। खासकर ऐसे गांव जहां बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं, वहां विधायक की अनुपस्थिति और उदासीनता का असर और भी गंभीर रूप से महसूस हो रहा है। नवापारा की यह स्थिति सिर्फ़ एक गांव की नहीं,b बल्कि सिस्टम की उस असफलता की मिसाल है जहां घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन अमल के नाम पर जीरो हैं।
अब समय है कि विधायक महोदय अपनी रील्स से बाहर निकलें, अपने प्रचार से थोड़ा विराम लें और उन लोगों की ओर देखें जिन्होंने उन्हें सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया। क्योंकि जनता अब पानी नहीं, जवाब मांग रही है। और अगर यही हाल रहा, तो आने वाले विधानसभा चुनाव 2028 में जनता जवाब भी देगी।

