बलरामपुर। छत्तीसगढ़ में एक ओर सरकार ‘सुशासन तिहार’ मनाकर अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुँचाने का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं बलरामपुर जिले का नहलूपाठ गाँव सरकारी दावों की कलई खोल रहा है। विकास की मुख्यधारा से जुड़ने की जद्दोजहद कर रहे इस गाँव के 28 परिवारों के नसीब में आज भी स्वच्छ पानी नहीं है। आलम यह है कि यहाँ के ग्रामीण खेत की मेड़ पर गड्ढा खोदकर अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं।

विडंबना की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब हाल ही में एक शादी समारोह के दौरान बारातियों को इसी गड्ढे का गंदा पानी परोसा गया, जिससे वर और वधु पक्ष के बीच विवाद की स्थिति निर्मित हो गई। कुसमी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले इस क्षेत्र से कभी नक्सलवाद का खात्मा हुआ था, लेकिन आज यहाँ के लोग पंचायत स्तर के कर्मचारियों की संवेदनहीनता और उपेक्षा के ‘लाल आतंक’ से जूझ रहे हैं।
गाँव में पेयजल संकट का मुख्य कारण पंचायत सचिव की मनमानी है। करीब डेढ़ महीने पहले दो स्थानों पर नलकूप खनन तो किया गया, जहाँ पानी का स्तर भी अच्छा मिला, लेकिन रहस्यमयी कारणों से उनमें हैंडपंप के उपकरण ही नहीं लगाए गए। ग्रामीण सिस्टम की इस लाचारी को लेकर जब पास ही के गाँव चांदो में आयोजित समाधान शिविर पहुँचे, तो सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज ने मामले की गंभीरता को समझते हुए अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई।

सांसद ने दो टूक शब्दों में हिदायत दी कि ग्रामीणों को तत्काल स्वच्छ पानी मिलना चाहिए और शाम तक कार्य प्रगति की फोटो भेजने के निर्देश दिए। यह स्थिति दर्शाती है कि कैसे मैदानी अमला कागजों पर योजनाओं को पूर्ण दिखाकर वरिष्ठ अधिकारियों को गुमराह करता है, जबकि धरातल पर लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। सांसद की इस सख्ती के बाद अब नहलूपाठ के ग्रामीणों को उम्मीद जगी है कि उनकी प्यास बुझाने के लिए अब उन्हें गड्ढों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।

