सरगुजा जिले में आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए बनाई गई सरकारी योजना पर सवाल खड़े होने लगे हैं। अंत्यावसायी सहकारी वित्त एवं विकास निगम द्वारा जिन दुकानों का निर्माण आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों को स्वरोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था, आज उन्हीं दुकानों पर रसूखदारों का कब्जा है। सबसे हैरानी की बात यह है कि यह पूरा मामला जिला प्रशासन की नाक के नीचे वर्षों से चलता आ रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली।

मामला अंबिकापुर के घड़ी चौक स्थित अंत्यावसायी सहकारी वित्त एवं विकास निगम की सात दुकानों और एक गोदाम का है। शासन की मंशा थी कि इन परिसंपत्तियों का लाभ अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के पात्र हितग्राहियों को मिले ताकि वे अपना रोजगार स्थापित कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। लेकिन वर्तमान में इन दुकानों का संचालन उन लोगों के हाथों में है, जिनका इस योजना के वास्तविक उद्देश्य से कोई लेना-देना नहीं है।
सरगुजा जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में इस तरह की स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ भी प्रभावशाली लोगों तक सीमित हो जाए, तो फिर शासन की मंशा और योजनाओं का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर इतने लंबे समय से इन दुकानों पर कथित अवैध कब्जा होने के बावजूद संबंधित विभाग ने कोई प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की।

जिला प्रशासन की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है। कलेक्टर अजीत वसंत के नेतृत्व में प्रशासन लगातार सुशासन और पारदर्शिता की बात करता है, लेकिन यदि सरकारी संपत्तियों पर इस तरह वर्षों से कथित कब्जा बना हुआ है, तो यह प्रशासनिक निगरानी पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। देखना होगा कि क्या सरगुजा कलेक्टर अजीत वसंत इस मामले में संज्ञान लेकर पात्र आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के लोगों को उनका अधिकार दिलाने की दिशा में कार्रवाई करते हैं, या फिर यह मामला भी रसूखदारों के प्रभाव के आगे ठंडे बस्ते में चला जाएगा।
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