सरगुजा, छत्तीसगढ़। अंबिकापुर के ब्रह्मरोड स्थित राम मंदिर के सामने 23 अप्रैल को दोपहर करीब 11 बजे लगी भीषण आग ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया। यह कोई साधारण आगजनी नहीं थी, बल्कि अवैध रूप से संचालित प्लास्टिक और पटाखा गोदाम में लगी ऐसी भयावह आग थी, जिसने देखते ही देखते पूरी इमारत को राख में बदल दिया और आसपास के 7 घरों को भी अपनी चपेट में ले लिया।
घटना के बाद हालात इतने खराब हो गए कि पूरे मोहल्ले को तीन दिनों तक बिजली, पानी और भोजन जैसी मूलभूत सुविधाओं के बिना गुजारना पड़ा। छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने भय और असहायता के बीच दिन बिताए। यह सिर्फ एक हादसा नहीं था, बल्कि एक ऐसी लापरवाही का परिणाम था, जो लंबे समय से पल रही थी।

अब इस पूरे मामले में गोदाम मालिक मुकेश अग्रवाल ने सोशल मीडिया के जरिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है। उन्होंने घटना पर दुख जताते हुए पड़ोसियों से क्षमा याचना की और प्रशासन व फायर ब्रिगेड का धन्यवाद भी किया। लेकिन सवाल यहीं खड़ा होता है,क्या इतनी बड़ी चूक के बाद सिर्फ माफी मांग लेना काफी है?
शहर के बीचों-बीच, घनी आबादी वाले इलाके में अवैध रूप से प्लास्टिक और विस्फोटक सामग्री (पटाखों) का भंडारण करना अपने आप में गंभीर खतरा था। यही कारण रहा कि आग ने कुछ ही समय में विकराल रूप ले लिया। अगर समय रहते आग पर काबू नहीं पाया जाता, तो यह हादसा और भी बड़ी त्रासदी में बदल सकता था।
स्थानीय लोगों का गुस्सा भी अब सामने आने लगा है। उनका कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि सिस्टम की भी नाकामी है। आखिर इतने बड़े पैमाने पर अवैध भंडारण कैसे चलता रहा? क्या प्रशासन को इसकी भनक नहीं थी, या फिर अनदेखी की गई?
अब मांग उठ रही है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई की जाए और पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा मिले। क्योंकि यह सिर्फ संपत्ति का नुकसान नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी के साथ किया गया खिलवाड़ है।
माफी अपनी जगह है, लेकिन न्याय और जवाबदेही उससे कहीं ज्यादा जरूरी है। वरना ऐसे हादसे दोबारा होने में देर नहीं लगेगी।

