मैनपाट के उडुमकेला क्लस्टर में आयोजित जनसमस्या निवारण शिविर में शासन ने योजनाओं और स्टॉलों के जरिए सुशासन का संदेश देने की कोशिश की, लेकिन जमीनी हकीकत कई सवाल खड़े कर रही है। 11 ग्राम पंचायतों से पहुंचे ग्रामीणों ने 1060 आवेदन सौंप दिए, जिनमें 1025 मांग और 35 शिकायतें शामिल हैं। इतने बड़े पैमाने पर आवेदन आना ही यह बताने के लिए काफी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत समस्याएं अब भी गंभीर बनी हुई हैं।
शिविर में अलग-अलग विभागों के करीब 19 स्टॉल लगाए गए और योजनाओं की जानकारी दी गई, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से सड़क, बिजली, पानी, राशन, आवास और प्रमाण पत्र जैसी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। कई लोगों ने आरोप लगाया कि अधिकारी केवल शिविरों और कागजी योजनाओं तक सीमित हैं, जबकि गांवों में सुविधाओं का वास्तविक लाभ नहीं पहुंच पा रहा।
सवाल यह भी उठता कि अगर शासन की योजनाएं सही तरीके से लागू हो रही हैं, तो फिर एक ही शिविर में हजारों आवेदन क्यों जमा हो रहे हैं? कई पंचायतों में आज भी लोगों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
कार्यक्रम में नेताओं और अधिकारियों ने समय-सीमा में निराकरण के निर्देश दिए, लेकिन ग्रामीणों को अब भी भरोसा कम और इंतजार ज्यादा नजर आ रहा है। लोगों का कहना है कि हर साल शिविर लगते हैं, घोषणाएं होती हैं, प्रमाण पत्र बांटे जाते हैं, लेकिन गांवों की तस्वीर में बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता।
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, खराब सड़कें, अधूरी आवास योजनाएं और बेरोजगारी जैसे मुद्दे अब भी लोगों की सबसे बड़ी परेशानी बने हुए हैं। ऐसे में “सुशासन” के दावों के बीच यह शिविर कहीं केवल सरकारी प्रचार तक सीमित न रह जाए, इस पर भी सवाल उठने लगे हैं।

