नई दिल्ली। केरल की धरती से उठी बदलाव की लहर ने दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में जश्न का सैलाब ला दिया है। पांच राज्यों के चुनावी रुझानों में कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) ने केरल में न केवल निर्णायक बढ़त बनाई है, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से एलडीएफ के दस साल के किले को ढहा दिया है। राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल की मौजूदगी में कटते केक और गूंजते नारों के बीच इस जीत का पूरा श्रेय राहुल गांधी की रणनीति और पार्टी की एकजुटता को दिया जा रहा है। कांग्रेस के खेमे में उत्साह इस कदर है कि सांसद इमरान प्रतापगढ़ी इसे देशव्यापी जीत का मॉडल मान रहे हैं, तो वहीं जेबी माथेर ने इसे जनता का वह ‘उपहार’ बताया है जिसने कांग्रेस को ‘सीटों का शतक’ पार करा दिया है।
इस राजनीतिक उलटफेर के पीछे राज्य की जमीनी समस्याओं को मुख्य कारण माना जा रहा है। दिग्गज नेता शशि थरूर के अनुसार, पिछले एक दशक में वामपंथी शासन के दौरान रोजगार के अवसरों का अकाल पड़ा, जिससे युवाओं का पलायन बढ़ा और यही असंतोष अब बदलाव के रूप में सामने आया है। हालांकि मतगणना अभी जारी है, लेकिन के सुरेश जैसे नेता आश्वस्त हैं कि 100 से अधिक सीटों के साथ यूडीएफ एक मजबूत सरकार बनाने की ओर अग्रसर है, जिसकी अगली रूपरेखा हाईकमान और सहयोगी दलों के साथ तिरुवनंतपुरम में तय होगी।
दिलचस्प बात यह है कि जहां केरल में कांग्रेस अपना परचम लहरा रही है, वहीं अन्य राज्यों की तस्वीर मिली-जुली है। हरियाणा के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी स्वीकार किया कि केरल की मेहनत ने परिणाम दिए हैं, जबकि बंगाल और असम जैसे राज्यों में चुनौतियां अब भी बरकरार हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी 193 सीटों के साथ प्रचंड बढ़त बनाए हुए है, जबकि तृणमूल कांग्रेस 95 सीटों पर सिमटती दिख रही है।
तमिलनाडु में एक नया राजनीतिक अध्याय जुड़ता दिख रहा है जहां ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ 105 सीटों के साथ चौंकाने वाली बढ़त पर है, और सत्ताधारी डीएमके 58 सीटों पर संघर्ष कर रही है। असम में भाजपा 78 सीटों के साथ अपनी पकड़ मजबूत किए हुए है, जहां कांग्रेस 20 सीटों पर सिमटी नजर आती है। पुडुचेरी में भी स्थिति भाजपा और उसके सहयोगियों के पक्ष में झुकती दिख रही है। हालांकि ये शुरुआती रुझान हैं, लेकिन केरल की यह ‘सेंचुरी’ कांग्रेस के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है।

