छत्तीसगढ़ की घनी पहाड़ियों में बसी, एक ऐसी जनजाति जिसे देश का राष्ट्रपति ‘दत्तक पुत्र’ मान चुका है—वहीं पहाड़ी कोरवा जनजाति आज बेसहारा है। सरगुजा ज़िले के लुंड्रा ब्लॉक के चिरागा गांव के बेवरापारा मोहल्ले में डारिया (दस्त) ने कहर बरपा दिया है। 27 परिवारों वाले इस छोटे से मोहल्ले में 14 लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं और एक ने दम तोड़ दिया।
केंद्र सरकार ने वर्ष 2023-24 में प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत इस जनजाति के लिए 15,000 करोड़ रुपए आवंटित किए थे। मकसद था—इन लोगों को सुरक्षित घर, साफ पानी, शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और बेहतर कनेक्टिविटी जैसी मूलभूत सुविधाएं देना। लेकिन आज, जब गांव के बच्चे गंदा पानी पीने को मजबूर हैं और इलाज के लिए किलोमीटरों पैदल चलना पड़ता है, तब सवाल उठता है—ये पैसा गया कहां?
घटना के बाद ज़िले के कलेक्टर विलास भोस्कर गांव पहुंचे, निरीक्षण किया, आश्वासन दिए। पर क्या ये कदम बहुत देर से नहीं उठाया गया? क्या सरकारें सिर्फ तब जागती हैं जब कोई मर जाता है? क्यों नहीं पहले से इन संवेदनशील इलाकों को ध्यान में रखते हुए सुविधाएं दी जातीं?
यह हाल सिर्फ बेवरापारा का नहीं है। देशभर में सैकड़ों आदिवासी बस्तियां आज भी उसी हाल में जी रही हैं जैसे दशकों पहले जीती थीं। योजनाएं बनती हैं, बजट पास होता है, लेकिन ज़मीन पर हालात जस के तस बने हुए है।
अब सवाल यह है कि ज़िम्मेदारी किसकी है? प्रशासन की, जो ज़मीनी हालात को लेकर गंभीर नहीं है? या उन गांववालों की, जिन्हें अपनी जान गवाकर, सरकार का ध्यान खींचना पड़ता है?
पहाड़ी कोरवा सिर्फ एक जनजाति नहीं, वो भारत की आत्मा का हिस्सा हैं। अगर उनकी चीखें भी राजधानी तक नहीं पहुंचतीं, तो हमें खुद से पूछना होगा—क्या वाकई हम एक लोकतांत्रिक और संवेदनशील समाज हैं?

