सरगुजा,छत्तीसगढ़। किसी भी जिले में जब एक आईएएस अधिकारी कलेक्टर बनकर पदभार संभालता है, तो वहां की जनता उससे विकास, पारदर्शिता और संवेदनशील प्रशासन की उम्मीद करती है। सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल, पर्यावरण और संसाधनों से समृद्ध जिले में यह उम्मीद और भी ज्यादा होती है। लेकिन सरगुजा में कलेक्टर रहे विलास भोस्कर का दो साल से अधिक का कार्यकाल अगर पलटकर देखा जाए, तो विकास से ज्यादा विवाद, और जनहित से ज्यादा उद्योग हित के फैसले सामने आते नजर आते हैं।
विलास भोस्कर के कार्यकाल में सरगुजा लगातार उन फैसलों के कारण सुर्खियों में रहा, जिन्हें लेकर स्थानीय ग्रामीण, आदिवासी समाज और पर्यावरण प्रेमी सड़कों पर उतरते रहे। अडानी कोल खदान के विस्तार को मंजूरी देना हो या अमेरा कोल माइंस में खनन विस्तार, हर बड़े फैसले का सीधा असर ग्रामीणों की जमीन, जंगल और आजीविका पर पड़ा। अमेरा खदान क्षेत्र में ग्रामीणों और पुलिस के बीच हुई झड़प ने प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े किए, जहां अपनी जमीन बचाने निकले ग्रामीणों पर आंसू गैस के गोले दागे गए।
मैनपाट जैसे छत्तीसगढ़ के “शिमला” कहे जाने वाले क्षेत्र में बॉक्साइट प्लांट को लेकर दी गई मंजूरी भी विलास भोस्कर के कार्यकाल का सबसे विवादित अध्याय रही। जहां एक ओर मैनपाट अपनी हरियाली, पर्यटन और खेती के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर वहां खनन और प्लांट की अनुमति को स्थानीय लोग सीधे अपने अस्तित्व पर हमला मानते रहे। जनसुनवाइयों में विरोध, बहिष्कार और प्रशासन के खिलाफ आक्रोश साफ दिखाई देता रहा, लेकिन फैसलों की दिशा नहीं बदली।
अगर सरगुजा में शिक्षा, स्वास्थ्य, आदिवासी रोजगार, ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं या पर्यावरण संरक्षण के बड़े और स्थायी कामों की बात की जाए, तो विलास भोस्कर का कार्यकाल इन मोर्चों पर कमजोर नजर आता है। जनता जिस “विकास मॉडल” का सपना देख रही थी, वह कागजों और फाइलों से आगे निकलता नहीं दिखा। उल्टे, खदानों के विस्तार और उद्योगों को लेकर जिले की पहचान एक बार फिर संघर्ष और विरोध के रूप में उभरती रही।
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यह सवाल अब सरगुजा की जनता खुलकर पूछ रही है कि क्या एक कलेक्टर का काम सिर्फ फाइलों पर हस्ताक्षर करना होता है या फिर लोगों की पीड़ा को समझना भी उसकी जिम्मेदारी होती है? क्या आदिवासी जिले में विकास का मतलब सिर्फ खनन और उद्योग ही रह गया है?
हालांकि अब कलेक्टर विलास भोस्कर का सरगुजा से तबादला हो चुका है। लेकिन उनके पीछे छूटे फैसले, विवाद और असंतोष अभी भी जिले में मौजूद हैं। अब निगाहें नए प्रशासनिक नेतृत्व पर टिकी हैं कि क्या सरगुजा को आगे विकास की नई दिशा मिलेगी या फिर यह जिला यूं ही उद्योग बनाम आदिवासी संघर्ष का मैदान बना रहेगा।
सरगुजा की जनता के लिए यह सिर्फ एक अधिकारी का तबादला नहीं, बल्कि उम्मीद है कि शायद अब जिले की तस्वीर बदलेगी।


बहुत बढ़िया हुआ. आय ए एस बनना अलग बात है प्रशासन का बागडोर संभाल कर सुव्यवस्थित संचालन करना भिन्न है. प्रशासन का सु संचालन करने के लिए कोई जरूरी नहीं कि वे आय ए एस ही हों अनुभव ज्यादा काम आता है.