अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला मुख्यालय अम्बिकापुर में सियासत और विकास का जो वीभत्स खेल चल रहा है, उसने सूबे की ‘साय सरकार’ के सुशासन के दावों की कलई खोलकर रख दी है। डबल इंजन और ट्रिपल इंजन सरकार के चमचमाते नारों के बीच धरातल पर सच सिर्फ इतना है कि यहां की बदहाल और गड्ढों से छलनी सड़कें पूरी तरह ‘टॉय-टॉय फूस’ साबित हो चुकी हैं। नगर निगम में जब कांग्रेस की हुकूमत थी, तब भाजपाई बदहाली को लेकर छाती पीटते थे और आज जब केंद्र, राज्य समेत खुद नगर निगम में भाजपा का पूर्ण बहुमत का राज है, तब भी शहर की तकदीर जस की तस है। विकास के नाम पर पिछले दिनों जो कुछ पैच-वर्क या मरम्मत का काम हुआ भी, वह महज ‘थूक-पॉलिश’ और लीपापोती से ज्यादा कुछ नहीं था, जिसमें केवल जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई का बंदरबांट और जमकर भ्रष्टाचार हुआ, जबकि आम जनता आज भी इस नरक में पीसने को मजबूर है।
इस बदहाली के बीच सबसे हैरान और विचलित करने वाला सच यह सामने आया है कि जिले में लोकतंत्र के चुने हुए प्रतिनिधियों पर बेलगाम अफसरशाही पूरी तरह हावी हो चुकी है। इसका ज्वलंत प्रमाण खुद नव-निर्वाचित महापौर मंजूषा भगत के उस तीखे और बेबस बयान से मिलता है, जिसने प्रशासनिक गलियारे में हड़कंप मचा दिया है। महापौर ने सरेआम राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) के आला अधिकारियों की ढीठता को बेनकाब करते हुए स्वीकार किया है कि शहर की जनता ने उन्हें वोट दिया है और वे टैक्स वसूलते हैं, इसलिए जनता को बुनियादी सुविधाएं मांगना उनका संवैधानिक अधिकार है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस विभाग के कानों पर जूं नहीं रेंग रही, उसके अधिशासी अभियंता (EE) इतने मगरूर हो चुके हैं कि क्षेत्र के भाजपा सांसद चिंतामणि महाराज द्वारा 10 बार फोन किए जाने और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री के सीधे दखल के बाद भी काम करने को तैयार नहीं हैं। सत्ताधारी दल के ही सांसद-मंत्री की इस तरह सरेआम अनदेखी और उनकी राजनीतिक हैसियत को ‘साइडलाइन’ कर देने की इस घटना ने साफ कर दिया है कि साय सरकार के राज में मंत्रियों की चलती है या निरंकुश नौकरशाहों की।
महापौर मंजूषा भगत ने खुली चेतावनी दी है कि वे अब एनएच विभाग की इस तानाशाही से पूरी तरह तंग आ चुकी हैं और यदि अलॉट हो चुके टेंडर के बावजूद अगले 15 दिनों या एक महीने के भीतर धरातल पर काम शुरू नहीं हुआ, तो वह बेहद उग्र और कड़ा रुख अख्तियार करेंगी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि जब सरकार के कैबिनेट मंत्री और निर्वाचित सांसद की गरिमा को कोई छोटा अधिकारी रत्ती भर भाव देने को तैयार नहीं है, तो क्या महज एक चेतावनी से एनएच के इन बेलगाम अफसरों की सेहत पर कोई असर पड़ेगा? अब देखने वाली बात होगी कि आगामी एक महीने में शहर की सड़कों की सूरत बदलती है या फिर नौकरशाही का यह अभेद्य किला महापौर मंजूषा भगत को भी उनके सांसद और मंत्री की तरह हाशिए पर धकेल कर अपनी मनमानी जारी रखेगा। जनता अब कोरे बयानों और राजनीतिक नूराकुश्ती से थक चुकी है; सत्तासीनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में केवल तीखी बयानबाजी से नहीं, बल्कि धरातल पर ठोस काम करने से ही जनता का मान और खुद का सम्मान सुरक्षित रहता है।

