अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ : सरगुजा संभाग का मुख्यालय—जहां से तीन-तीन राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरते हैं। यह शहर पूरे संभाग का चेहरा माना जाता है, लेकिन सड़कों की हालत देखकर शर्म आती है। हकीकत यह है कि यहां सफर करना किसी अजमाइश से कम नहीं। धूल, गड्ढे और जलभराव से लोग रोजाना जूझ रहे हैं।
ताजा मामला शहर के सबसे व्यस्त चौक, अम्बेडकर चौक का है। यहां गड्ढों की वजह से इलेक्ट्रिक ऑटो पलट गया, वहीं एक बाइक भी बुरी तरह फिसल गई। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि शहर की रोजमर्रा की सच्चाई है। एम.जी. रोड हो या बनारस रोड—जगह-जगह गड्ढे, धूल और बदहाल सड़कें लोगों की मुसीबत बढ़ा रही हैं। हल्की सी बारिश होते ही सड़कें पूरी तरह तालाब बन जाती हैं।
खरसिया नाका, जो कटनी और गुमला को जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग है, वहां का हाल ऐसा है कि गाड़ी चलाते वक्त लगता है मानो खेत में हल चला रहे हों। यही हाल बलरामपुर-रामानुजगंज रोड का है, जहां सफर अब भगवान भरोसे ही होता है। अम्बिकापुर के कई इलाके ऐसे हैं जहां सड़क कहना मुश्किल है कि वो सच में सड़क है या गड्ढों का जाल।
सोचने वाली बात है कि सरगुजा संभाग से चार मंत्री आते हैं, प्रदेश का मुख्यमंत्री खुद यहीं से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन जनता की परेशानियों से मानो किसी का कोई लेना-देना ही नहीं। जब सवाल उठाए जाते हैं तो हमेशा एक ही जवाब मिलता है—“बारिश की वजह से दिक्कत है, बारिश के बाद मरम्मत होगी।” सवाल यह है कि जब जनता हादसों और परेशानियों से हर दिन गुजर रही है तो क्या सरकार और जनप्रतिनिधियों का काम सिर्फ वादा करना है? क्या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जा सकती?
पिछले कई सालों में लोग बार-बार सड़कों की मरम्मत और सुधार की मांग उठाते रहे हैं। कई बार आंदोलन हुए, धरना-प्रदर्शन हुए, लेकिन इन नेताओं और अधिकारियों के कानों में जूँ तक नहीं रेंगी। जनता जिसने भरोसा कर इन्हें सत्ता तक पहुँचाया, वही जनता अब रोज़ हादसों की कीमत चुका रही है। कहीं ऑटो पलटता है, कहीं बाइक, तो कहीं लोग पैदल चलते-चलते चोटिल हो रहे हैं।
अब बड़ा सवाल यह है—क्या अम्बिकापुर की जनता की आवाज कभी सरकार तक पहुँचेगी? क्या सरगुजा संभाग की सड़कों को मरम्मत मिल पाएगी? या फिर ये सड़कें ऐसे ही मौत का जाल बनी रहेंगी और नेता अपनी गाड़ी एसी में बैठकर जनता की पीड़ा से आंख मूँदते रहेंगे?

