नवरात्रि, जिसे शक्ति की उपासना और श्रद्धा के पर्व के रूप में मनाया जाता है, अब आस्था का उत्सव कम और व्यापार का साधन ज़्यादा बन चुका है। अंबिकापुर में गरबा और डांडिया के नाम पर हर साल करोड़ों का कारोबार होता है। शहर के नामी होटल Sargawa The Palace Resort और पर्पल ऑर्किड इस कारोबार के सबसे बड़े अड्डे बन चुके हैं। यहां श्रद्धा और संस्कृति की जगह अब ग्लैमर, तड़क-भड़क और टिकट बेचकर नोट छापने की होड़ है।
चौंकाने वाली बात यह है कि इन आयोजनों में शामिल होने के लिए लोगों से हजारों रुपए लिए जाते हैं, लेकिन करोड़ों की कमाई के बावजूद सरकार को एक रुपया टैक्स तक नहीं चुकाया जाता। जीएसटी विभाग और प्रशासनिक अमला भी आँख मूँदकर बैठा है। आयोजकों का न तो कोई पंजीयन है, न ही कोई ट्रस्ट या समिति रजिस्टर्ड है। सीधी भाषा में कहें तो अंबिकापुर में नवरात्रि की आस्था की आड़ में हर साल करोड़ों का कारोबार होता है और सरकार को खुलेआम चूना लगाया जाता है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इन आयोजनों में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाए जा रहे हैं वे चेहरे, जिनकी पहचान आस्था या संस्कृति से नहीं, बल्कि अश्लीलता और विवादों से है। सरगांव प्लेस में बुलाया जा रहा है अंजलि अरोरा को, वही अंजलि अरोरा जो कच्चा बादाम गाने पर अश्लील डांस कर वायरल हुई और जिनके सोशल मीडिया अकाउंट पर धार्मिक मूल्यों या संस्कृति की जगह केवल फूहड़पन और ग्लैमर परोसा जाता है। सवाल यह है कि क्या ऐसे चेहरे गरबा-डांडिया जैसे पावन आयोजनों की शोभा बढ़ाएंगे या आस्था को मज़ाक बनाएंगे?

दूसरी ओर, पर्पल ऑर्किड ने एल्विश यादव को मुख्य मेहमान बनाने का फैसला किया है। वह नाम जो स्नेक वेनम केस में जेल जा चुका है और जिसकी पहचान सोशल मीडिया पर विवाद और अभद्रता से है। अब ऐसे व्यक्तियों को नवरात्रि के पावन अवसर पर सम्मान की कुर्सी पर बैठाना आखिर किस संदेश को दर्शाता है?

सबसे चौंकाने वाला सच यह है कि पर्पल ऑर्किड ने इस आयोजन को पूरा धंधा बना डाला है। यहां अगर कोई व्यक्ति सेलिब्रिटी के साथ सिर्फ़ एक फोटो खिंचवाना चाहता है तो उसे ₹11,000 चुकाने होंगे। चार लोगों के लिए एक टेबल पर बैठकर खाना खाने का रेट ₹21,000 रखा गया है। वहीं अगर आप फोटो और खाना दोनों का पैकेज लेना चाहें तो उसकी कीमत सीधी ₹25,000 तक पहुँचा दी गई है। सवाल यह है कि आखिर गरबा और डांडिया जैसे धार्मिक आयोजन के नाम पर लोगों से इस तरह की वसूली करना क्या श्रद्धा का अपमान नहीं है?
हकीकत यही है कि मां दुर्गा की भक्ति का पर्व अब होटलों और इवेंट कंपनियों की नजर में सिर्फ़ मोटी रकम कमाने का साधन बन गया है। श्रद्धालु जहां माता की आराधना के लिए गरबा और डांडिया में शामिल होना चाहते हैं, वहीं आयोजक इसे सस्ते मनोरंजन, बॉलीवुड स्टार्स और विवादित चेहरों के प्रचार का मंच बना चुके हैं। धर्म और आस्था के नाम पर किया जा रहा यह सौदा न सिर्फ़ श्रद्धालुओं की भावनाओं का अपमान है, बल्कि प्रशासन और टैक्स विभाग की नाकामी पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।
नवरात्रि का रंग अब भक्ति का नहीं, बल्कि नोटों का रंग बन चुका है और इसमें आस्था को बाजार में नीलाम करने का गुनाह खुलेआम किया जा रहा है।

