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अंबिकापुर स्थित संकल्प हॉस्पिटल से सामने आई यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की बेरुखी और लापरवाही की तस्वीर बनकर उभरी है। यहां काम करने वाली एक महिला, जो पिछले दो वर्षों से गार्ड की नौकरी कर अपने परिवार का सहारा बनी हुई थी, उसकी मौत उस वक्त हो गई जब वह जनरेटर में डीजल भर रही थी और उसकी चुन्नी मशीन में फंस गई। जिस अस्पताल में वह दूसरों की सुरक्षा के लिए खड़ी रहती थी, वहीं उसकी अपनी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं था।

घटना के बाद जो हुआ, उसने इंसानियत को और शर्मसार कर दिया। अस्पताल प्रबंधन ने शुरुआत में महज 25 हजार रुपये की सहायता राशि और बेटी का खर्च उठाने का आश्वासन देकर मामले को शांत करने की कोशिश की, लेकिन यह बात परिजनों को स्वीकार नहीं हुई। गुस्से और दुख से टूटे परिजनों ने शव को सड़क पर रखकर विरोध शुरू कर दिया। करीब 4 घंटे तक चिलचिलाती धूप में शव सड़क पर पड़ा रहा, लोग जमा होते रहे, लेकिन अस्पताल प्रबंधन का कोई जिम्मेदार चेहरा वहां नहीं पहुंचा।

स्थिति तब बदली जब सड़क जाम हुआ और प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन मौके पर पहुंचा और आखिरकार 9 लाख रुपये में समझौता कर मामला शांत कराया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं क्या एक कर्मचारी की जान की कीमत इतनी ही है? क्या बिना किसी सुरक्षा के कर्मचारियों से ऐसे खतरनाक काम करवाना सही है?
जनरेटर जैसे उपकरणों के पास काम करते समय कर्मचारियों को उचित सुरक्षा दी जानी चाहिए थी सेफ्टी ड्रेस, ट्रेनिंग, मशीनों पर सुरक्षा कवर और आपातकालीन व्यवस्था जैसे बुनियादी उपाय अगर मौजूद होते, तो शायद यह हादसा टल सकता था। साथ ही कर्मचारियों के लिए बीमा, दुर्घटना कवर और अन्य कानूनी सुरक्षा भी जरूरी होती है, जो ऐसे मामलों में परिवार को सहारा दे सके।

अंबिकापुर की यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उस लापरवाही का आईना है जिसमें एक इंसान की जिंदगी का मोल कुछ लाख रुपये में तय कर दिया जाता है। अब सवाल यह है कि आखिर कब तक ऐसे निजी संस्थान नियमों को दरकिनार कर अपनी मनमानी करते रहेंगे, और कब किसी की जान की कीमत सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह जाएगी।

