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अम्बिकापुर। सरगुजा जिले के गांधीनगर थाना पुलिस की कार्यशैली एक बार फिर गंभीर सवालों और गहरे संदेह के घेरे में है। प्रतापपुर रोड पर सरगंवा और सकालो के बीच रूटीन चेकिंग के दौरान पकड़ी गई तेलंगाना नंबर की संदिग्ध पिकअप (TG 19 T 1494) को लेकर पुलिस ने जो रुख अपनाया, उसने खाकी पर गंभीर दाग लगा दिए हैं। चारों तरफ से बंद और वेंटिलेशन विहीन वाहन में 50 बेजुबान बकरों को ठूंस-ठूंसकर लावारिस सामान की तरह ले जाया जा रहा था। यह साफ तौर पर पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (PCA Act, 1960) और पशु परिवहन नियम (Transport of Animals Rules, 1978) के तहत अपराध का सीधा मामला था। इसके बावजूद गांधीनगर पुलिस ने पूरे मामले को मात्र मामूली मोटर व्हीकल (MV) एक्ट के चालान में समेटकर वाहन को रफा-दफा कर दिया। इस जल्दबाजी के बाद अब पुलिस पर सीधे तौर पर ‘अंदरूनी सौदेबाजी’ और मोटी रकम के लेन-देन के एवज में केस को दबाने के संगीन आरोप लग रहे हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आए वीडियो फुटेज से साफ जाहिर होता है कि पिकअप के भीतर बकरों की हालत अत्यंत दयनीय और दमघोंटू थी। न तो जानवरों के खड़े होने की जगह थी और न ही पानी या हवा की कोई व्यवस्था। क्रूरता की हद यह थी कि वाहन के पीछे लकड़ी के गुटके ठोककर पूरे हिस्से को इस तरह छिपाया गया था ताकि बाहर से भीतर लदे मवेशी नजर न आएं। यह सुनियोजित तस्करी और क्रूरता का प्रत्यक्ष प्रमाण था। केंद्रीय पशुपालन एवं डेयरी विभाग की नियमावली के तहत 4.5 से 5 टन क्षमता वाले वाहनों में भी 40 से अधिक मवेशी ले जाने की मनाही है, जबकि यहां एक छोटी पिकअप में लगभग 50 बकरे ठूंसे गए थे। इसके बावजूद पुलिस ने इस गंभीर संज्ञेय अपराध को नजरअंदाज कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू यह है कि पुलिस वाहन को जब्त कर थाने तो ले आई, लेकिन उसने पशु चिकित्सा विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगने दी। न तो किसी सरकारी पशु चिकित्सक को मौके पर बुलाया गया और न ही बेजुबानों का मेडिकल परीक्षण कराया गया। सवाल उठता है कि जब थाने में 50 तड़पते हुए मवेशी मौजूद थे, तब पुलिस ने वेटरनरी डॉक्टरों को सूचित करने से परहेज क्यों किया? क्या पुलिस को यह डर था कि पशु चिकित्सक की मेडिकल रिपोर्ट बनते ही क्रूरता की कानूनी धाराएं दर्ज करना मजबूरी बन जाएगा और ‘मामले को सेट’ करने का रास्ता बंद हो जाएगा? पशु चिकित्सा विभाग को अंधेरे में रखना पुलिस की नीयत पर सबसे बड़ा सवालिया निशान है।

स्थानीय स्तर पर अब यह चर्चा जोरों पर है कि तेलंगाना के इस वाहन को सिर्फ चालान काटकर छोड़ना महज लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित ‘लेन-देन’ का नतीजा है। नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले कथित तस्करों पर मेहरबानी दिखाते हुए धारा 11 के तहत एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई? अगर पुलिस का दामन साफ है, तो आला अधिकारियों को सामने आकर यह स्पष्ट करना होगा कि इतनी भारी क्रूरता को केवल एमवी एक्ट का चोला पहनाकर बेजुबानों को दोबारा उसी नरक में क्यों धकेल दिया गया? खाकी पर लगे इस संगीन दाग का जवाब अब सरगुजा पुलिस के जिम्मेदार अधिकारियों को देना ही होगा।

