सरगुजा, छत्तीसगढ़। सच लिखना, सच दिखाना और समाज के सामने असलियत रखना पत्रकारिता का मूल कर्तव्य है। लेकिन सरगुजा की धरती पर अब सच्चाई उजागर करना ही अपराध बन गया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है वकील डी.के. सोनी का रवैया, जो RTI के दम पर अपार संपत्ति खड़ी करने के आरोपों पर सवालों का सामना करने की बजाय अब बौखलाहट में पत्रकारों पर हमला बोल बैठे हैं।
कुछ दिनों पहले एक खबर प्रकाशित हुई थी जिसमें यह तथ्य उजागर किया गया कि कैसे डी.के. सोनी ने सूचना के अधिकार (RTI) का सहारा लेकर करोड़ों की संपत्ति अर्जित कर ली। यह खबर पूरी तरह दस्तावेज़ों और ठोस जानकारियों पर आधारित थी, जिसने समाज में बड़ा सवाल खड़ा किया कि आखिर एक साधारण वकील इतनी संपत्ति कैसे अर्जित कर गया। लेकिन इन सवालों का जवाब देने की बजाय डी.के. सोनी ने सीधे पत्रकारों पर कानूनी कार्रवाई कर दी।
उन्होंने नामजद तरीके से संचालक और संपादक के खिलाफ 25 लाख रुपए की मानहानि का लीगल नोटिस भेजा गया है। इतना ही नहीं, उन्होंने मानसिक प्रताड़ना का हवाला देते हुए 10 हजार रुपए अतिरिक्त मुआवजे की मांग भी की है। यह कदम साफ दर्शाता है कि सच का सामना करने की बजाय सोनी अब कानूनी हथकंडों से पत्रकारिता को दबाने का प्रयास कर रहे हैं।
समाज में खुद को प्रतिष्ठित व्यक्ति बताने वाले डी.के. सोनी की यह कार्रवाई इस बात का प्रमाण है कि जब भी कोई रसूखदार व्यक्ति अपनी असलियत सामने आते देखता है तो वह बौखला कर सच्चाई को दबाने की कोशिश करता है। सवाल यह है कि क्या सच्चाई दिखाने की कीमत पत्रकारों को चुकानी पड़ेगी?
पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर मानहानि के मुकदमे ठोकना आज उन लोगों का सबसे आसान हथियार बन चुका है जिनके खिलाफ तथ्यात्मक खुलासे सामने आते हैं। लेकिन क्या कलम की ताकत को कोर्ट-कचहरी के चक्कर और 25 लाख के भारी-भरकम नोटिस से दबाया जा सकता है? समाज इस पर गंभीर सवाल पूछ रहा है।
दरअसल, यह केवल एक पत्रकार या मीडिया संस्थान की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की लड़ाई है। सरगुजा में अगर सच्चाई को उजागर करने वाले कलमकारों को इस तरह डराने-धमकाने का प्रयास होगा तो आने वाली पीढ़ियों के सामने पत्रकारिता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
डी.के. सोनी की बौखलाहट साफ-साफ बताती है कि सच कितना कड़वा होता है। अगर आरोप निराधार होते तो वे तथ्यों और दस्तावेज़ों के साथ अपना पक्ष रखते, लेकिन ऐसा करने की बजाय उन्होंने नोटिस भेजने का रास्ता चुना। यही उनकी हकीकत है, यही उनकी असलियत है और यही उनकी मजबूरी भी।
अब सवाल जनता के बीच है—क्या सच दिखाना जुर्म है? क्या पत्रकारिता की कलम को करोड़ों की संपत्ति बनाने वालों के खिलाफ चुप रहना चाहिए? या फिर ऐसे कानूनी हथकंडों के बावजूद सच्चाई सामने लाने का साहस दिखाना चाहिए?

