अम्बिकापुर। हमेशा शहर के हर छोटे-बड़े मुद्दे पर माइक और कैमरे के सामने सबसे आगे खड़े दिखने वाले तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता अकील अहमद की भूमिका अब सीधे तौर पर कठघरे में आ खड़ी हुई है। भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा (महामाया मंडल) के महामंत्री धीरज सिंह द्वारा सोशल मीडिया पर सिलसिलेवार किए जा रहे हमलों और खुलासों ने शहर के सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। जनता के अधिकारों की लड़ाई का दावा करने वाले अकील अहमद के खिलाफ जिस तरह के संगीन आरोप सार्वजनिक मंच पर रखे जा रहे हैं, उसने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सामाजिक सेवा का यह चोला सिर्फ अपने विवादित अतीत और संदिग्ध गतिविधियों को छिपाने का एक जरिया मात्र था?

गंभीर आरोपों की झड़ी, हिंदू परिवार की प्रताड़ना और ब्लैकमेलिंग का खेल?
भाजपा नेता धीरज सिंह ने अपने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अकील अहमद पर सुनियोजित षड्यंत्र रचने के बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। पोस्ट में सीधे तौर पर कहा गया है कि एक हिंदू परिवार को मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित करने की साजिश रची जा रही थी। इतना ही नहीं, शहर के प्रतिष्ठित और सम्मानित नागरिकों की सामाजिक साख को बट्टा लगाने के लिए एक कैथलिक युवती का सहारा लेकर सुनियोजित जाल बुना गया। इसके अलावा, छात्रावास अधीक्षक से कथित तौर पर रंगदारी और अवैध वसूली के मामले को भी सार्वजनिक पटल पर लाया गया है। धीरज सिंह का दावा है कि उनके पास इन तमाम गतिविधियों से जुड़े पुख्ता साक्ष्य हैं, जिन्हें अब सरगुजा पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) तक औपचारिक रूप से पहुंचाया जा रहा है ताकि इस तथाकथित एक्टिविस्ट की पूरी कुंडली खंगाली जा सके।

मंचों पर दहाड़ने वाले नेताजी अब खामोश क्यों?
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू अकील अहमद का मौजूदा रवैया है। जो शख्स शहर में मामूली सी घटना पर भी तुरंत प्रतिक्रिया देने और खुद को न्याय का सबसे बड़ा पैरोकार साबित करने के लिए आगे आ जाता था, वह इतने गंभीर और निजी चरित्र पर लगे आक्षेपों के बाद अचानक पूरी तरह से परिदृश्य से गायब नजर आ रहा है। धीरज सिंह के सीधे हमलों और जनता के बीच उठ रहे तीखे सवालों के बावजूद अकील की यह रहस्यमयी चुप्पी कई तरह के संदेहों को जन्म दे रही है। शहर की जनता अब यह पूछने लगी है कि अगर इन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है, तो तथाकथित जनसेवक सामने आकर बिंदुवार खंडन क्यों नहीं कर रहा है? क्या यह चुप्पी अपनी गलतियों को स्वीकार करने का अप्रत्यक्ष संकेत है?
छवि चमकाने का मुखौटा या दागदार इतिहास?
स्थानीय नागरिकों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या अकील अहमद का अतीत वाकई इतना दागदार है कि उसके बचाव के लिए उनके पास कोई शब्द नहीं बचे हैं? आरोप लगाने वालों का साफ तौर पर कहना है कि समाजसेवा के नाम पर केवल व्यक्तिगत प्रभाव कायम करने और अपनी संदिग्ध गतिविधियों पर पर्दा डालने का खेल खेला जा रहा था। जब तक पर्दे के पीछे सब कुछ दबा था, तब तक ‘मसीहा’ की छवि बेची जा रही थी, लेकिन जैसे ही कानून और जनता की अदालत में मामले उठने लगे, वैसे ही तथाकथित कार्यकर्ता भूमिगत हो गए हैं।
फिलहाल, इस मामले ने पूरे सरगुजा क्षेत्र में तूल पकड़ लिया है। अब देखना यह होगा कि धीरज सिंह द्वारा आरोपों का जो बम फोड़ा जा रहा है उसकी सच्चाई क्या है, और क्या अकील अहमद अपनी इस खामोशी को तोड़कर सामने आने का साहस जुटा पाते हैं या फिर यह चुप्पी उन पर लगे तमाम आरोपों पर मुहर लगा देगी।

