अम्बिकापुर। छत्तीसगढ़ के सरगुजा से लेकर राजधानी रायपुर तक सत्ता की हनक और रसूख का ऐसा नंगा नाच चल रहा है, जिसने आम जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है। सरगुजा जिले के राजापुर उप तहसील में पदस्थ एक नायब तहसीलदार के साथ सरेआम मारपीट होती है, विधायक और उनके समर्थकों पर गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज होता है, लेकिन कानून के हाथ इतने बौने हो चुके हैं कि गिरफ्तारी के नाम पर सिर्फ और सिर्फ सियासी ड्रामेबाज़ी चल रही है।
सवाल उठता है कि जब देश का कानून सबके लिए बराबर है, तो एक माननीय और उनके समर्थकों पर मेहरबानी क्यों बरसाई जा रही है? क्या छत्तीसगढ़ में अब खाकी, खादी के तलवे चाटने को मजबूर हो चुकी है? इस पूरे तमाशे के बीच सबसे बड़ा झटका उस बेबस और लाचार जनता को लगा है, जो कड़कड़ाती धूप में अपने छोटे-छोटे काम करवाने तहसील कार्यालय पहुंच रही है, लेकिन वहां काम नहीं हो रहा हैं। अधिकारियों-कर्मचारियों की कलम बंद है, दफ्तर वीरान हैं और जनता बैरंग लौटने को मजबूर है। आखिर जनता की इस बर्बादी का जिम्मेदार कौन है?
इस पूरे बवाल की जड़ में पारिवारिक रसूख और सत्ता का अहंकार साफ दिखाई देता है। सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो की बहन को अपने पति की पैरोल के लिए एक हैसियत प्रमाण पत्र (शोध क्षमता प्रमाण पत्र) बनवाना था। नियम-कायदे ताक पर रखकर काम कराने की जिद जब अधूरी कागजी कार्रवाई के कारण पूरी नहीं हुई, तो इसे अहंकार पर चोट मान लिया गया। भाई को फोन घनघनाया गया, बदतमीजी का रोना रोया गया और फिर जो हुआ, उसने लोकतंत्र को शर्मसार कर दिया।
आरोप है कि माननीय विधायक अपने समर्थकों के साथ राजापुर के बीच चौराहे पर सिंघम बनने पहुंच गए और सरेआम एक प्रशासनिक अधिकारी (नायब तहसीलदार) की मर्यादा को तार-तार करते हुए मारपीट की गई। अब बचाव में तहसीलदार पर भी काउंटर एफआईआर दर्ज करा दी गई है, ताकि मामले को उलझाया जा सके। लेकिन जनता पूछ रही है कि अगर एफआईआर दर्ज है, तो पुलिस हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी है? क्या गिरफ्तारियों के लिए शुभ मुहूर्त का इंतजार किया जा रहा है?
अब इस गंभीर प्रशासनिक संकट पर सियासत की रोटियां सेंकने का खेल भी शुरू हो चुका है। पूरा मामला अब इंसाफ की लड़ाई कम और ‘हाई-वोल्टेज ड्रामा’ ज्यादा बन चुका है। पूर्व मंत्री अमरजीत भगत ने तंज कसते हुए जो कहा, वह इस सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा है “मैंने पहली बार सुना है कि कोई सरेंडर करने आईजी दफ्तर जाता है, अगर इरादा साफ था तो पास के थाने में जाकर घुटने टेक देते, इस ड्रामेबाजी की क्या जरूरत थी?” बात सच भी है, आत्मसमर्पण के नाम पर आईजी दफ्तर की परिक्रमा करना सिर्फ और सिर्फ कानून की आंखों में धूल झोंकने और गिरफ्तारी से बचने का पैंतरा है।
इधर कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ के आह्वान पर समूचे प्रदेश में कलम बंद हड़ताल है। तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारी कलेक्ट्रेट के सामने धरने पर बैठे हैं, और पीड़ित नायब तहसीलदार चीख-चीख कर कह रहा है कि दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए उसका और विधायक का नार्को टेस्ट करा लिया जाए। लेकिन हुक्मरान बहरे हो चुके हैं। न्याय कब होगा, यह कोई नहीं जानता। फिलहाल तो छत्तीसगढ़ की धरती पर कानून का जनाजा निकल रहा है और भुगत सिर्फ आम जनता रही है।

