अंबिकापुर: सरगुजा जिले के अंबिकापुर में आज उरांव जनजाति ने पारंपरिक आस्था और प्रकृति के प्रति अपनी गहन श्रद्धा का प्रतीक सरहुल पर्व बड़े धूमधाम से मनाया। इस अवसर पर शहर में एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसने पूरे नगर को उल्लास और उत्साह से भर दिया। “धरती माता की जय” और “सरना माता की जय” के जयघोषों के साथ शुरू हुई यह शोभायात्रा पटेल पारा से निकलकर शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए सरना स्थल पर समाप्त हुई।
शोभायात्रा में उरांव समाज के लोगों ने पारंपरिक वेशभूषा धारण कर ढोल, मांदर और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर लोकनृत्य प्रस्तुत किया। इस दौरान पूरा वातावरण जयकारों और संगीतमय धुनों से गूंज उठा। यह पर्व न केवल प्रकृति के प्रति सम्मान और आभार का प्रतीक है, बल्कि उरांव जनजाति की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को भी उजागर करता है। सरहुल को ‘धरती पूजा’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें प्राकृतिक संतुलन और सभी समुदायों की खुशहाली की कामना की जाती है।
शोभायात्रा के दौरान उरांव समाज के लोगों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे हिंदू हैं और हिंदुत्व के प्रति उनकी अटूट निष्ठा है। उनके लिए यह पर्व जीवन का अभिन्न अंग है, जो पीढ़ियों से उनकी संस्कृति, परंपराओं और पहचान को जीवित रखे हुए है।
शशि किरण खेस, उपाध्यक्ष, उरांव समाज, सरगुजा
“सरहुल हमारी आस्था और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। हम हिंदू हैं और अपनी परंपराओं को जीवित रखते हुए हिंदुत्व के लिए समर्पित रहेंगे। यह पर्व हमारी एकता और सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाता है।”
इस आयोजन ने न केवल उरांव समाज की एकता और गौरव को प्रदर्शित किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि प्रकृति और संस्कृति का संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है। शोभायात्रा में शामिल लोगों का उत्साह और समर्पण देखते ही बना।

