सारगुजा, छत्तीसगढ़। सरगुजा जिले के रामगढ़ की पहाड़ियों पर हो रहे खनन से दरारें पड़ने का मुद्दा अब मज़ाक बनकर रह गया है। जांच के नाम पर जो टीम गठित की गई थी, उसकी पृष्ठभूमि पूरी तरह राजनीतिक थी, तकनीकी नहीं। संयोजक शिवरतन शर्मा एमए llb हैं, वहीं विधायक रेणुका सिंह और पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल केवल 12वीं पास हैं जो जांच के दौरान मौजूद थे। सदस्य अखिलेश सोनी एमए पास हैं। हैरानी की बात यह है कि पर्यटन मंत्री टीम का हिस्सा नहीं थे, लेकिन पूरे समय साथ मौजूद रहे और निरीक्षण के नाम पर फोटोशूट और मौज-मस्ती में व्यस्त नज़र आए।
कुछ घंटों के सामान्य निरीक्षण के बाद टीम ने यह कह दिया कि “कोई खतरा नहीं है।” लेकिन असल सवाल यह है कि जब जांच में शामिल लोग तकनीकी विशेषज्ञ ही नहीं थे, तो वे यह निष्कर्ष किस आधार पर दे सकते हैं?
भूवैज्ञानिक विमान मुखर्जी का स्पष्ट कहना है कि रामगढ़ का क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। यहां की चट्टानें 250–300 मिलियन वर्ष पुरानी बरकार सेंडस्टोन से बनी हैं, जो पेड़-पौधों और वर्षा के संतुलन से ही टिकाऊ रहती हैं। लगातार ब्लास्टिंग और गहराई तक खनन से इनकी संरचना कमजोर होती जा रही है, जिससे दरारें और भूस्खलन की आशंका और बढ़ रही है।
वहीं, रामगढ़ मंदिर के पुजारी ने भी बड़ा खुलासा किया है। उनका कहना है कि अदानी कोल माइंस में जब भी विस्फोट होता है, मंदिर तक हिल जाता है। कुछ दिन पहले ही पहाड़ी से एक बड़ा पत्थर नीचे सड़क पर गिरा और एक झाड़ भी सड़क पर आ गिरा था। पुजारी का मानना है कि अगर यही हालात जारी रहे, तो आने वाले दिनों में रामगढ़ की पहाड़ी और मंदिर दोनों पर बड़ा खतरा मंडराएगा।
रामगढ़ पर्वत सरगुजा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है। यहां खनन गतिविधियों को यदि नियंत्रित दूरी और स्तर पर सीमित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह विरासत सिर्फ टूटे पत्थरों का ढेर बनकर रह जाएगी।
यह पूरा मामला यह साबित करता है कि सरकार और नेताओं के लिए जनता की आस्था और पर्यावरणीय सुरक्षा से ज्यादा अहम अपनी राजनीतिक मौजूदगी और कैमरे में कैद होना है। जांच के नाम पर जो दिखावा हुआ, उसने यह साफ कर दिया कि रामगढ़ की सुरक्षा राजनीतिक बयानों की मोहताज बना दी गई है, जबकि हकीकत यह है कि खतरा हर दिन और गहराता जा रहा है।

