अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर शहर में नगर निगम की अकर्मण्यता और प्रशासनिक संवेदनहीनता का ऐसा स्याह आलम पसरा है कि अब यह किसी से छिपा नहीं रहा। खुद को विकास का पर्याय साबित करने की होड़ में करोड़ों रुपये फूंककर चमचमाता नया निगम कार्यालय तो खड़ा कर दिया गया, लेकिन विडंबना देखिए कि उसी नए दफ्तर की नाक के ठीक नीचे गुजरने वाले ‘गौरव पथ’ पर सूरज ढलते ही श्मशान जैसा सन्नाटा और घनघोर अंधेरा पसर जाता है। जो स्ट्रीट लाइटें जनता की सुरक्षा और सुविधा के लिए रात में जगमगाने के लिए लगाई गई थीं, वे खंभों पर कबाड़ की तरह लटकी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। यहां तक कि नए भवन पर शान से लगा नगर निगम का ग्लो-साइन बोर्ड भी पूरी तरह बुझा हुआ है, मानो निगम प्रशासन अपनी ही नाकामी पर पर्दा डालने के लिए अंधेरे की चादर ओढ़कर दुबक गया हो। जब अपने ही मुख्यालय के सामने रोशनी करने की औकात और नीयत नहीं बची, तो ऐसे तामझाम और दिखावे का क्या मतलब रह जाता है?
मुख्यमंत्री के वादे खोखले हुए साबित
सूबे के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय मंचों से गरज-गरज कर कहते हैं कि प्रदेश में बुनियादी सुविधाओं और विकास के नाम पर सरकारी खजाने में पैसों की कोई कमी नहीं है। मगर अम्बिकापुर नगर निगम के ढर्रे को देखकर यह सवाल सीधे हुक्मरानों के सीने में चुभता है कि आखिर वह अथाह बजट किस गटर में समा रहा है? क्या सरकार का विकास सिर्फ भाषणों, विज्ञापनों और फाइलों के पन्नों तक सिमट कर रह गया है? सड़कों की छलनी हो चुकी हालत से जनता पहले ही त्रस्त थी, और अब शहर की लाइफलाइन माने जाने वाले मुख्य मार्ग को अंधेरे के हवाले कर हादसों और अपराधों को खुला न्योता दिया जा रहा है। जनता टैक्स भरे तो समय पर, लेकिन बदले में उसे मिले जानलेवा गड्ढे और खौफनाक अंधेरा! यही है निगम की असल कार्यशैली।
नगर निगम की कार्यशैली पर उठे सवाल
निगम की सत्ता पर काबिज महापौर और कुंभकर्णी नींद में सोए आला अधिकारियों की बेशर्मी का आलम यह है कि रोजाना उसी अंधेरे रास्ते से उनकी गाड़ियां गुजरती हैं, फिर भी उनकी आंखों का मोतियाबिंद दूर नहीं हो रहा। गौरव पथ तो सिर्फ एक बानगी भर है; शहर के आधा दर्जन से अधिक प्रमुख वार्डों और कॉलोनियों की स्ट्रीट लाइटें या तो हफ्तों से फुंक चुकी हैं या फिर किसी डिस्को की तरह लपझप-लपझप कर जनता का मखौल उड़ा रही हैं। जब जनप्रतिनिधियों और लापरवाह अफसरों से बुनियादी सुविधाएं तक नहीं संभल रहीं, तो वे किस मुंह से जनता के सेवक होने का ढोंग रचते हैं? यह अंधेरा सिर्फ सड़क पर नहीं, बल्कि अम्बिकापुर नगर निगम की रीढ़विहीन व्यवस्था और अंधी प्रशासनिक व्यवस्था का काला चेहरा है, जिस पर अब जनता का गुस्सा उबलने लगा है।

